‘‘प्रगतिशीलता कोई लटका नहीं जिसे लेखक सिद्धांत के रूप में अपना ले । प्रगतिशीलता का वास्तविक सुंगधित फूल वहीं खिलता है, जहाँ वह  देसी ज़मीन से रस लेने में कोताही न बरते । लेखक यदि उधार की वैचारिकता व आधुनिकता के हथियार जुटाकर अपनी इर्रेशनेल्टी से लड़ना चाहता है तो उसे कदाचित पराजय का मुँह ही ताकना पड़ेगा । और इतना ही नहीं संदर्भहीन समाजवादी हथियारों के सहारे भी वह काम्य की प्राप्ति नहीं कर सकता ।

आप प्रेमचंद को देखिए, वे अपने समाज के इर्रेशनल हिस्से से ही अपनी कथा के उपकरण उठाकर किस ख़ूबसूरती से वर्ग-समाज का चित्रांकन कर देते हैं । आप प्रेमचंद की मंत्र, नागपूजा आदि कहानियों को ज़रा एक बार फिर से पढ़कर देख लें । मंत्र के मूल में है - लोककथा की स्मृति । प्रेमचंद जैसा लेखक अपने बूढ़े देश की स्मृतियों को ख़ारिज़ नहीं कर सकता । इसे प्रेमचंद की विशेषता कहें कि पुरखों की स्मृति उन्हें पीछे नहीं धकेलती, वरन अग्रसर बनाती है । लोककथा में नागिन तृप्त होने के बाद अपने पुरुष को मार डालती है । नागपूजा में आदमी नाग को मार कर पहले तो अपनी स्त्री को मुक्त करता है, उसके बाद उसे भोगता है ।

पहले का आदमी असहाय था और प्रकृति प्रबल । आज का आदमी प्रकृति के सम्मुख असहाय नहीं रह गया है । प्रकृति का उपभोग करने के पहले रूढ़ विचारों और जड़ विश्वासों को ख़त्म करना होगा । सांप के औरत में बदलने से कम छोटा चमत्कार यह नहीं कि जमाने से चली आ रही यह दकियानूस और अवैज्ञानिक लगने वाली लोककथा प्रेमंचद के हाथ पड़कर बेहद रेशनल और प्रगतिशील रचना में बदल गई है ।
 
                प्रेमचंद इर्रेश्नल के निषेध को ही रेशनेल्टी नहीं मानते थे । निषेध तो अपने आप में ही विरोध की स्वीकृति है । इर्रेशनल तत्वों को पछाड़ने के लिए उसी की ताक़त का लीवर के तौर के उपयोग कर लेने में वे माहिर थे । ’’
 
प्रमोद वर्मा

 
         
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